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05 मार्च 2012

ज़बान वक्फ है बस मदहे अस्करी के लिए

इमाम हसन अस्करी (अ.स.) की विलादत के मौके पर मीर हसन मीर की एक मंक़बत:


न खुसरवी के लिए है न अफसरी के लिए
ज़बान वक्फ है बस मदहे अस्करी के लिए

अगर न मिलती इन्हें नूरे अस्करी की ज़कात
तरसते चाँद सितारे भी रौशनी के लिए

गिराया आप का रौज़ा जिन्हों ने ऐ मौला
शिकार पहला बनेंगे वह आखिरी के लिए

इमाम फिर से बुलाएं मुझे भी सामर्रा
तरस रही है जबीं कब से बंदगी के लिए

मेरे इमाम का हमसर वह कैसे लाते भला
मिला न जब कोई क़मबर की हम्सरी के लिए

यह बोले दार पे मीसम मैं कैसे रुक जाऊं 
ज़बां मिली है मुझे सिर्फ अली अली के लिए

अली को देख के बालिं पर मैं पुकारूँगा
ऐ मेरी मौत ठहर जा तू दो घडी के लिए

हमें यह फख्र के हम उन के दर के नौकर हैं
फ़रिश्ते खुद जहाँ आते हैं नौकरी के लिए

नबी की आल से टकराए क्या ज़रूरी है
तरीके और भी राएज हैं ख़ुदकुशी के लिए

अलम बराए सहबा था जंगे खैबर में
अलिफ़ से सब के लिए ऍन से अली के लिए