irfan allahabadi लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
irfan allahabadi लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
14 अप्रैल 2014
15 सितंबर 2012
"एहानते रसूल" की मज़म्मत पर इरफ़ान इलाहाबादी के चार मिसरे
अफ़सोस का मक़ाम है इरफ़ान जाने क्यूँ ?
तौहीने मुस्तफा प भी लब खोलते नहीं
हैरत ये है की हिंद के हिन्दू हैं मोतरिज़
सब बोलते हैं पर ये अरब बोलते नहीं
28 मार्च 2012
गाह ज़हरा कभी अली ज़ैनब
क्या करूं मैं सना तेरी ज़ैनब
तुझ पे सदके सुखनवरी ज़ैनब
तेरे शीरीं सुख़न का क्या कहना
तेरा सानी नहीं कोई ज़ैनब
खुश कलामी से आप लगती हैं
गाह ज़हरा कभी अली ज़ैनब
जिस क़बीले का चाँद है अब्बास
है उसी घर की चांदनी ज़ैनब
तेरा इरफ़ान मिल गया जिसको
उसकी दुनिया संवर गई ज़ैनब
इरफ़ान इलाहाबादी
लेबल:
hazrta zainab,
irfan allahabadi,
my karari
25 जनवरी 2012
इरफ़ान इलाहाबादी का कलाम
![]() |
| Irfaan Allahabadi, a young poet |
वारिसे अह्मदे मुख्तार तक आते आते
हक तलफ हो गया हक़दार तक आते आते
खुम में अहमद से तो कहते रहे बखखिन बखखिन
फिर गए हैदरे कररार तक आते आते
दम निकल जाता है ईमान का बे हुब्बे अली
खानाए काबा की दीवार तक आते आते
रोकने निकली थी हैदर के फ़ज़ाइल दुनिया
थक गई मीसमे तम्मार तक आते आते
लोग समझे थे सिमट जाएगा ज़िक्रे हैदर
हक मगर फैल गया दार तक आते आते
या अली कहते ही इरफ़ान सहेम जाती हैं
मुश्किलें मुझ से गुनाहगार तक आते आते
लेबल:
haider,
irfan allahabadi,
karrar,
kavi,
my karari
सदस्यता लें
संदेश (Atom)

