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28 सितंबर 2010

खुर्शीद मुज़फ्फर नगरी हिन्दुस्तान के मशहूर कसीदा पढने वालों में शुमार किये जाते हैं. उनकी आवाज़ का जादू सुनने वाले को मसहूर कर देता है. नीचे विडियो में उन्हों ने वोह कसीदा पढ़ा है जो तकरीबन 15 से 20 साल पुराना है. मगर जब वोह अपने मखसूस अंदाज़ में पढ़ते हैं तो बिलकुल ताज़ा मालूम होता है. सुनने वाला चाहे कितना ही थका हुआ हो वोह अपनी थकान को भूल कर अहले बैत की मोहब्बत में डूब जाता है. खुदा, खुर्शीद भाई की आवाज़ को हमेशा तरो ताज़ा रखे .

18 सितंबर 2010

"यौमे ग़म "

आज 8 शव्वाल. 1925 में आले सऊद ने मदीना में जन्नतुल बक़ी पर बने मासूमीन के रोजों को शहीद करवाया था. इस वाकए को याद करते हुए दुनिया भर के मुसलमान "यौमे ग़म " मनाते हैं.

01 सितंबर 2010

ज़फर की नज़र से

21 रमजान की सुबह जैनाबिया इमामबाड़ा में मौला अली (अ.स.) के ताबूत बरामद होने  के बाद ज़फर (पापा) ने अपने तास्सुरात पेश किये .  ज़फर का ताल्लुक तलाब्पर करारी से है.

05 अगस्त 2010

जब इमाम आयेंगे

जब इमाम आयेंगे. सिब्ते जफ़र की मशहूर नज़्म जिसमे उन्हों ने हमारे ज़मीर को झिंझोड़ने की कोशिश की है और एक हद तक कामयाब हुए हैं. उसका असर होता है चाहे थोड़ी देर के लिए ही क्यूँ न हो. आप की खिदमत में पेश है.

01 अगस्त 2010

सुरूद: या इमामे ज़माँ आप क्यूँ हैं निहां

यह तराना तकरीबन दस साल पहले बॉम्बे में १५ शाबान के जश्न में पढ़ा गया था . इस तराने को मरहूम अल्लामा जीशान हैदर जवादी ने लिखा था. इस को स्कूल के बच्चों ने बहुत ख़ूबसूरती से पढ़ा है.