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01 दिसंबर 2012

मुहर्रम के बाद बॉम्बे वापसी

करारी कर्बला में शामे गरीबां का  मंज़र 
करारी ने बहुत तरक्की की है। करारी में ज़मीन इलाहबाद से ज्यादा महंगी है। करारी की आबादी में भी बहुत इज़ाफा हुआ है। अब करारी के नौजवानों को तरके वतन करके बाहर मज़ीद पढाई के लिए इलाहबाद जाने की ज़रुरत नहीं रही, क्यूंकि करारी में डा रिज़वी डिग्री कॉलेज के खुल जाने की वजह से बच्चों को पढाई में काफी आसानी हो गई है।
इन सब आसानियों के बावजूद करारी में 'इन्टरनेट ' सेवा बहुत ही ख़राब है।
मुहर्रम में नेट की सुस्त रफ्तारी  की वजह से update करना मुश्किल हो गया था। करारी की अज़ादारी के सिलसिले में मालूमात बहुत हैं, बॉम्बे वापसी हो रही है इंशाअल्लाह थोडा  थोडा  करके upload होता रहेगा। आप की दुआ दरकार है।  

03 दिसंबर 2011

कर्बला की जानिब जाने वाला जुलूसे अजा

छे मुहर्रम को अकील अब्बास के घर से (चमन गंज) कर्बला के लिए दो  पहर ३ बजे जुलूस अजा बरामद होता है.
इस जुलूस में शबिहे ज़ुल्जनाह भी साथ होता है.
अंजुमन की कोई क़ैद नहीं है. साहेबे बयाज़ नौहा पढ़ते हैं और अज़ादार मातम करते हुए कर्बला कि जानिब बढ़ते हैं.
इस का शुमार  क़दीमी जुलूस में होता है. मरहूम एजाज़ अब्बास उर्फ़ मुन्ने साहब बहुत एहतिमाम किया करते थे. अब भी यह बड़ी शानो शौकत से बरामद किया जाता है.
सूरज डूबते ही अपनी मंजिल कर्बला पहुँच जाता है.
कर्बला में इदारे इस्लाम की जानिब से जनाब राशिद रिज़वी के जेरे इंतज़ाम चाय की सबील लगती है. चाय की इस  सबील की शुरूआत मरहूम सय्यद  गुलाम हसनैन करारवी ने तकरीबन 18 साल पहले की थी. पहले यह चाय अबुल हसन की चक्की के आगे बनी जाती थी. लेकिन जब इस की तकसीम से जुलूस में बाधा आने लगी तो इसे कर्बला में मुन्ताकिल कर दिया गया.
पहली से दस मुहर्रम में कर्बला में ख़त्म होने वाले चार जुलूस हैं.
मुहर्रम की पांच, छे, सात और रोज़े आशुरा का जुलूस.
हज़रत अब्बास (अ.स.) की दरगाह 
चाय का एहतिमाम