21 अप्रैल 2020

वह आदमी पक्के इरादों और मुकम्मल यक़ीन वाला था

साम्राज्यवाद और प्रतिगामी की क़ैंची से हमेशा ही ऊंची उड़ान भरने वालों के परों को कतरा जाता रहा रहा है।
यह और बात है कि ऊंची उड़ान भरने वाले बाज़ों की उड़ान परों के कतरे जाने के बावजूद इतनी ऊंची होती है कि उस तक पहुंचना मुमकिन नहीं होता।
आप इतिहास उठा कर देख लीजिए साम्राज्यवाद और प्रतिगामी विचारधारा रखने वाले हमेशा आज़ाद फ़िक्र रखने वालों के ख़िलाफ़ मैदान में डटे दिखाई देंगे उनके साथ कुछ ऐसे निजी फ़ायदे के पीछे भागने वाले भी होंगे जिनकी दाल रोटी कभी पर्दे की आड़ में तो कभी बिना पर्दे के इसी पर डिपेंड है कि वह हर वैल्यू का सौदा करें, हर तहरीक का गला घोंटने के लिए तैयार रहें, हर तरह की जागरूकता को अपने लिए मौत का पैग़ाम समझें।
यह निजी फ़ायदे के भूखे लोग हमेशा प्रतिगामी विचारधारा रखने वाले लोगों के साथ साम्राज्यवाद के देव की आंखों का तारा रहे हैं उनके साथ एक और वर्ग खड़ा दिखाई देता है जो मसलेहत पसंदों का है, इन मसलेहत की चादर लपेटे रहने वालों ने साम्राज्यवाद और प्रतिगामी फ़िक्र वालों के साथ मिलकर वक़्त के ग़ुलामों का हमेशा बचाव किया है।
और इन्हीं के बचाव की वजह से दीन में बिदअत का चलन फैलना शुरू हुआ और दीन ही के नाम पर दीन का चेहरा बिगाड़ा जाता रहा, जबकि दीन में ग़ैर दीनी बातों को शामिल करने का फ़ायदा कहीं न कहीं इन्हीं प्रतिगामी सोंच वालों और साम्राज्यवाद के वकीलों, निजी स्वार्थ वालों और दल बदलुओं को मिलता रहा जो दीन के नाम पर लोगों को बेवक़ूफ़ बना कर अपना उल्लू सीधा करते रहे, जबकि मसलेहत की चादर ओढ़े रहने वाले इन लोगों के लिए बचाव के तरीक़े निकालते रहे,
प्रतिगामी सोंच हो या साम्राज्यवाद के चरणों में आस्था के फूल निछावर करने वाले पत्थरों के पुतले और दीनी कवच में लिपटे हुए इल्हाद और बे दीनी रस्मों के बुत इन सब पर उपमहाद्वीप (भारत और पाकिस्तान) में कड़ा प्रहार दीनदारी की तहरीक और मिशन की शक्ल में हुआ जो एक इंक़ेलाबी लहर की तरह दिल और दिमाग़ को झिंझो‍ड़ते हुए आगे बढ़ती गई, और उस मंज़िल तक पहुंची कि बड़े बड़े बुतों के टूटने की आवाज़ें क़ौम ने अपने कानों से सुनी।
यह इंक़ेलाब कोई कम न था कि "बच्चे अमल में बाप से आगे निकल गए"।
बच्चे अमल में बाप से आगे निकल गए अब एक नारा नहीं बल्कि ऐसी हक़ीक़त है जिसे हर ज़िंदा ज़मीर अपने इलाक़े, मोहल्ले और गांव देहात से लेकर शहरों तक महसूस कर सकता है।
हाल ही में तंज़ीमुल मकातिब की तरफ़ से होनी वाली दीनी तालीमी कांफ्रेंस में जिस तरह एक बच्ची ने क़ुरआन ज़ुबानी याद कर के सुनाया उसे देख कर हर एहसास रखने वाले की आंख छलक उठी और सीना गर्व से चौड़ा हो गया कि ख़तीबे आज़म जाते जाते हमें उस दीनदारी की डगर पर मोड़ गए जहां केवल हज़रत ज़हरा स.अ. की कनीज़ होने के दावे नहीं किए जाते बल्कि उनकी सीरत पर अमल कर के ख़तीबे आज़म की डगर पर चलते हुए हमारे बच्चे उसी रविश और तरीक़े को चुन रहे हैं जो किसी ज़माने में जनाब फ़िज़्ज़ा का हुआ करता था, उनकी ज़िंदगी में क़ुरआन है उनकी बातों में क़ुरआन है, जो लोग कहते हैं कि दीनदारी की तहरीक और मिशन में अब क्या है जो कुछ था वह पहले था, न अब पहले जैसे लोग रहे और न पहले जैसा जज़्बा तो वह लोग भूल जाते हैं पैग़म्बर स.अ. के दौर जैसे लोग क्या अब हैं? या वैसा जज़्बा किसी में पाया जाता है जो इमाम अली अ.स. में था या जो अबूज़र और सलमान में था?
जज़्बों की परख का यूं तो हमारे पास कोई पैमाना नहीं लेकिन इतना यक़ीन से कहा जा सकता है कि आज भी अबूज़र और सलमान के क़दम की ख़ाक को अपनी आंखों का सुरमा बनाने वाली हस्तियां मौजूद हैं, कहीं आयतुल्लाह ख़ामेनई की शक्ल में तो कहीं आयतुल्लाह सीस्तानी की शक्ल में तो कहीं सैयद हसन नसरुल्लाह की शक्ल में, और कुछ गुमनाम सिपाहियों की सूरत में जो मासूम की मौजूदगी से लेकर ग़ैबत तक बातिल के सामने वैसे ही डटे हैं जैसे इनका नबी उनके आमाल को देख रहा हो।
पैग़म्बर स.अ. की 23 साल की सुधार करने वाली ज़िंदगी में अगर वह रंग पैदा हो सकता है चौदह सौ साल में उठने वाले हज़ारों तूफ़ान उसके रंग को फीका न कर सकें तो इस बात में भी कोई शक नहीं कि उन्हीं की मेहनत और सबक़ को लोगों तक पहुंचाने वाले ख़तीबे आज़म के ख़ुलूस का रंग भी इतना हल्का नहीं जो कुछ आंधियों के चलने या कुछ अरकान के गुज़र जाने से फीका पड़ जाए, यही वजह है कि दीनदारी की तहरीक और मिशन ने जिस तरह कल प्रतिगामी और साम्राज्यवाद, ख़ानदानी अना (अकड़) को अल्लामा ग़ुलाम असकरी र.ह. के मुताबिक़ "शाही" को ज़लील किया इसी तरह आज भी इस तहरीक में वह दम है कि आज के दौर के वैचारिक बुतों को तौहीद के वार से जड़ से उखाड़ सकती है लेकिन उसके लिए इब्राहीमी नज़र की ज़रूरत है जिसका अपने अंदर पैदा करना मुश्किल ज़रूर है लेकिन अगर ख़्वाहिशात पर कंट्रोल हो तो ना मुमकिन भी नहीं है।
इब्राहीमी नज़र बड़ी मुश्किल से पैदा होती है, "हवस छुप छुप कर सीनों में बना लेती हैं तस्वीरें"
अल्लाह! कैसी इब्राहीमी नज़र थी इस सदी की अज़ीम हस्ती की, जो न केवल समाज में अपने हाथों तराशे गए बुतों को तोड़ रहा था बल्कि ऐसे बुतों के तोड़ने वालों की तरबियत की फ़िक्र भी उसे थी जो हमेशा इब्राहीमी इरादों और हौसलों के साथ "तौहीद" को बचाने के लिए हर नमरुद के सामने कामयाबी के ज़ामिन बन जाएं।
यही वजह है कि आज भी साम्राज्यवाद को मदरसों से ख़तरा महसूस हो रहा है और मदरसों को लेकर उनकी साज़िश अब भी जारी है, मदरसों में तालीम हासिल करने वाले चाहे जिस जगह जिस रंग या जिस नस्ल के भी क्यों न हों आज इसीलिए साम्राज्यवादी ताक़तों के निशाने पर हैं क्योंकि उन्हें केवल तालीम नहीं दी जाती बल्कि दिल में छिपे अहंकारी बुतों के तोड़ने का हुनर भी सिखाया जाता है जो ख़ुद इसी तालीम का हिस्सा है।
इतिहास गवाह है कि जब भी कोई बुतों को तोड़ने वाला हिम्मत और हौसले के साथ सामने आया है, बुतों की पनाह में ख़ुद को मनवाने वालों ने उसे आग में फेंकने की कोशिश की है, यह और बात है कि अल्लाह की सुन्नत यह है कि अगर तुम उसकी राह में बुतों को तोड़ोगे तो हज़ारों टन जलती हुई लकड़ियों की आग को भी वह ठंडी कर देगा।
शायद यही वजह थी कि घिसी पिटी रस्मों के बुतों को तोड़ने के लिए जब यह इब्राहीम का बेटा आगे बढ़ा तो हर तरफ़ से नुक्ता चीनी का ऐसा बाज़ार गर्म हो गया जो दहकती आग से कम नहीं था लेकिन अल्लाह पर ईमान ने उसे गुलज़ार बना दिया और आरोप, आलोचना और नुक्ता चीनी के बाज़ार से ख़तीबे आज़म मुस्कुराते हुए गुज़र गए, और न केवल उनकी हिम्मत और हौसले में कमी नहीं आई बल्कि इरादे में मज़बूती आती चली गई और हर आगे बढ़ने वाला क़दम पहले से और मज़बूती के साथ बढ़ गया।
"शिकस्त खा न सका वक़्त के ख़ुदाओं से
वह आदमी बड़े अज़्म व  यक़ीन वाला था"
अपने फ़ौलादी इरादों के बल पर ही ख़तीबे आज़म ने आले मोहम्मद के उलूम को फैलाने का बेड़ा अपने सर उठाया, अल्लाह पर भरोसा किया और काम शुरू कर दिया जिसका काम था उसकी मदद की, नतीजा यह है कि आज पहले से ज़्यादा दीनी जागरूकता पाई जाती है, दोस्त तो दोस्त दुश्मन भी उनके काम के फ़ायदे का इंकार नहीं कर सके।
ख़तीबे आज़म की इससे बड़ी कामयाबी क्या होगी कि जो तहरीक और मिशन उन्होंने छेड़ा था आज हर बेदार ज़मीर उसका हिस्सा बना हुआ है।
दीनी तालीम की बुनियाद पर मुर्दा ज़मीर बेदार हो रहे हैं और आज न केवल मदरसों में रौनक़ है बल्कि उनकी तादाद रोज़ाना बढ़ रही है, मज़हबी लेटरेचर का इस्तेक़बाल भी पहले से ज़्यादा हो रहा है।
कल दीन और क़ौम की जो ख़िदमत ख़तीबे आज़म और उनके साथी अंजाम दे रहे थे आज हर सूझबूझ रखने वाला वही अंजाम दे रहा है।
क़ौम और मिल्लत की ख़िदमत आज हर दीन की सूझबूझ रखने वाले का ख़ास मिशन है, दीनदारी की तहरीक से पहले और बाद की हालत इस बात की दलील है कि यह तहरीक लोगों के दिलों में घर बना चुकी है, जिन मदरसों की तादाद इस तहरीक से पहले उंगलियों पर गिनी जा सकती थी आज माशा अल्लाह उनकी तादाद सैकड़ों में पहुंच चुकी है।
इसका मतलब न केवल यह तहरीक ज़िंदा है बल्कि तहरीक पूरी क़ौम को ज़िंदा रखे हुए हैं, आप कोई मिशन, कोई नेक काम, कोई समाजी और क़ौमी तहरीक या इदारा नहीं दिखा सकते जहां ख़तीबे आज़म की तहरीक से जुड़े लोग डाइरेक्ट या अनडाइरेक्ट तौर पर मौजूद न हों, यह तहरीक के ज़िंदा होने की दलील नहीं तो और क्या है?
अगर हालात के पेशे नज़र अलग अलग जगहों पर शमा रौशन हो जाएं और हर शमा अपना काम कर रही हो तब भी उस असली शमा और चिराग़ को भुलाया नहीं जा सकता है जिसकी रौशनी से शमा जल कर अपने चारों तरफ़ उजाला कर रही है।
ख़तीबे आज़म की याद को ताज़ा करना उनकी फ़िक्र पर नज़र डालना उन्हें पढ़ना केवल उनके लिए अक़ीदत का इज़हार नहीं है बल्कि हमारे लिए सोंचने का मक़ाम है कि हम उस मज़बूत इरादे और बुलंद हौसले वाले अज़ीम मर्द के विचारों की रौशनी में यह देखें कि हम कहां खड़े हैं? और हमें कहां होना चाहिए?
आज भी हम अपने मोहसिन और मोअल्लिम की तरफ़ देखेंगे तो सारी मुश्किलों के बाद यही आवाज़ आएगी कि छोड़ो मुश्किलों को, मुश्किलें तो होती ही इसलिए हैं कि तुम्हारे जौहर को निखारा जा सके।
आज भी अना, घमंड और तकब्बुर के नक़्क़ार ख़ानों की आवाज़ों को दबाते हुए लिल्लाहियत में डूबी हुई एक दर्द भरी आवाज़ सुनाई देगी जो हमें आगे बढ़ने का हौसला दे रही है।
उठ कि ख़ुर्शीद का समाने सफ़र ताज़ा करें
नफ़से सूख़्ता ए शामो सहर ताज़ा करें

सैयद नजीबुल हसन ज़ैदी

24 जून 2019

बहमन में सेव्वुम की मजलिस


मरहूम रमजान हैदर (गोल्लन) इबने सय्यद रियाजुल हैदर के सेव्वुम की मजलिस, मंगल 25 June 2019 को मुम्बरा की बहमन सोसाइटी में मुनाकिद होगी ....मग़रिब की नमाज़ के बाद 

मरहूम का इन्तेकाल 22 June को बॉम्बे के नायर हॉस्पिटल में हुआ था, तद्फीन इतवार 23 June  मुम्बरा के कब्रस्तान में हुई. 

27 मई 2019

मीरा रोड में जुलूस - 21 Ramadhan


Inna lillaahe Wa Inna ilaihe Raaje-oon,


ASGHARI BANO Binte MANZOOR AALAM 
Ka abhi 4.00-AM NAIR HOSPITAL, MUMBAI Mein INTEKAL Ho Gaya Hai 
TADFEEN Ki ITTELA BAD Me Di Jayegi
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Aap Log Marhooma Ke Liye     
👉🏿SURE FATEHA Wa NAMAAZE WAHSHAT Zarur Padhen,
👉🏿 Asghari Bano BINTE Manzoor Alam,👈🏿
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Marhooma LAILA BAJI, Kaafi Dino Se Beemar Chal Rahi Theen, 
AMURA Ke Rahne Wali Theen 
MALONY MUMBAI Me Rahti Theen 

HASAN AKBAR (BABBU MIYA) MARHOOM Ki AHLIYA, 
SHAMMU BHAI, MAHTAB BHAI, RAIS Sb.-9619299681, TAHIR Sb. GUDDAN Sb. Ki WALIDA theen -9869765945,l

मरहूम एहसान हैदर जवादी की मजलिसे बरसी

29 जून को अल्लाहाबाद में.

18 जुलाई 2018

बुजुर्गों की याद

हम अपने रफ़्तगाँ को याद रखना चाहते हैं 
दिलों को दर्द से आबाद रखना चाहते हैं
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1. Marhum Sayyed Ghulam Hasnain Kararvi
2. Marhum Ameer Ali Rizvi
3. Marhum Sayyed Ghulam Sibtain Rizvi
Sons of Marhum Sayyed Ameer Ali Rizvi

20 जून 2018

आह ! मौलाना एहसान हैदर जवादी

ये ईद .......



गुज़र तो जाएगी तेरे बगैर भी लेकिन 

बहुत उदास बहुत बेक़रार गुजरेगी



11 मई 2018

Football dreams battle Israeli bullets


Muhammad Khalil Obeid is refusing to abandon his dream of becoming a professional football player.

After being shot in both knees by an Israeli sniper on 30 March, Obeid requires major surgery to have any chance of resuming his beloved game. Doctors have told the 23-year-old he would need to travel from Gaza to Germany or Turkey for that surgery.

Overcoming initial despair and determined that the operation take place, he has decided to search for a charity that will pay his costs.

“I dream of playing in Europe, I will not kill my dream,” he said. “And I will not let the Israeli occupation kill my dream.”

Obeid had been part of al-Salah club in Gaza since he was 17. As well as being a talented football player, he finished first in a Gaza marathon that he ran last year.

He is one of 27 competitive athletes injured during the Great March of Return between late March – when the protests began – and late April, according to Gaza’s youth and sports ministry.

A video which Obeid made capturing the moment he was shot during the protests has been widely viewed on the Internet. Obeid was accompanied by several other sports enthusiasts from the Deir al-Balah area of central Gaza at the time he was shot.

Life-changing injuries
A recent investigation by Amnesty International concluded that Israel may be deliberately causing life-changing injuries to people such as Obeid, who have taken part in the Gaza protests.

Amnesty has also cited evidence that Israel is using high-velocity rifles and bullets that expand on impact to cause maximum harm against protesters. Many of the weapons used by Israel against protesters are US-made.

Ata Ahmed Abu al-Hossna was shot by Israeli forces on Friday, 6 April – one week after Obeid.

The 27-year-old spent much of that day at a protest tent near Jabaliya, northern Gaza. When he saw youth burning tires – an effort to thwart Israel’s detection of targets for sniper fire – Abu al-Hossna decided that he should join them. Shortly afterwards, Israel began shooting live ammunition in the direction of demonstrators.

As he tried to flee for safety, Abu al-Hossna was shot in the left leg. “I do not remember what happened after that,” he said.





आँख फाड देने वाला सच


आँख फाड देने वाला सच, पढ कर आप भी आश्चर्य चकित रह जायेगे ?
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भारत में कुल 4120 MLA और 462 MLC हैं अर्थात कुल 4,582 विधायक।
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प्रति विधायक वेतन भत्ता मिला कर प्रति माह 2 लाख का खर्च होता है। अर्थात
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91 करोड़ 64 लाख रुपया प्रति माह। इस हिसाब से प्रति वर्ष लगभ 1100 करोड़ रूपये।
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भारत में लोकसभा और राज्यसभा को मिलाकर कुल 776 सांसद हैं।
इन सांसदों को वेतन भत्ता मिला कर प्रति माह 5 लाख दिया जाता है।
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अर्थात कुल सांसदों का वेतन प्रति माह 38 करोड़ 80 लाख है। और हर वर्ष इन सांसदों को 465 करोड़ 60 लाख रुपया वेतन भत्ता में दिया जाता है।
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अर्थात भारत के विधायकों और सांसदों के पीछे भारत का प्रति वर्ष 15 अरब 65 करोड़ 60 लाख रूपये खर्च होता है।
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ये तो सिर्फ इनके मूल वेतन भत्ते की बात हुई। इनके आवास, रहने, खाने, यात्रा भत्ता, इलाज, विदेशी सैर सपाटा आदि का का खर्च भी लगभग इतना ही है।
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अर्थात लगभग 30 अरब रूपये खर्च होता है इन विधायकों और सांसदों पर।
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अब गौर कीजिए इनके सुरक्षा में तैनात सुरक्षाकर्मियों के वेतन पर।
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एक विधायक को दो बॉडीगार्ड और एक सेक्शन हाउस गार्ड यानी कम से कम 5 पुलिसकर्मी और यानी कुल 7 पुलिसकर्मी की सुरक्षा मिलती है।
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7 पुलिस का वेतन लगभग (25,000 रूपये प्रति माह की दर से) 1 लाख 75 हजार रूपये होता है।
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इस हिसाब से 4582 विधायकों की सुरक्षा का सालाना खर्च 9 अरब 62 करोड़ 22 लाख प्रति वर्ष है।
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इसी प्रकार सांसदों के सुरक्षा पर प्रति वर्ष 164 करोड़ रूपये खर्च होते हैं।
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Z श्रेणी की सुरक्षा प्राप्त नेता, मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए लगभग 16000 जवान अलग से तैनात हैं।
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जिन पर सालाना कुल खर्च लगभग 776 करोड़ रुपया बैठता है।
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इस प्रकार सत्ताधीन नेताओं की सुरक्षा पर हर वर्ष लगभग 20 अरब रूपये खर्च होते हैं।
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अर्थात हर वर्ष नेताओं पर कम से कम 50 अरब रूपये खर्च होते हैं।
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इन खर्चों में राज्यपाल, भूतपूर्व नेताओं के पेंशन, पार्टी के नेता, पार्टी अध्यक्ष , उनकी सुरक्षा आदि का खर्च शामिल नहीं है।
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यदि उसे भी जोड़ा जाए तो कुल खर्च लगभग 100 अरब रुपया हो जायेगा।
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अब सोचिये हम प्रति वर्ष नेताओं पर 100 अरब रूपये से भी अधिक खर्च करते हैं, बदले में गरीब लोगों को क्या मिलता है ?
क्या यही है लोकतंत्र ?
(यह 100 अरब रुपया हम भारत वासियों से ही टैक्स के रूप में वसूला गया होता है।)

01 मई 2018

करारी के पास सड़क हादसा


करारी कस्बे के हज़रतगंज मोहल्ला निवासी चांद का बाइस वर्षीय पुत्र मोहम्मद आसिफ 5 बजे सुबह कार से इलाहबाद जा रहा था कि सराय अकिल थाना क्षेत्र के कुण्डरी गाँव के समीप जानवर को बचाने के चक्कर में कार पेड़ से टकरा गई जिससे चालक आसिफ की मौके पर मौत हो गई। और एनब रिज़वी पुत्र सैदुल हसन को गंबीर चोटें आई हैं जिसे जिसे जिला अस्पताल मंझनपुर भेजा गया। सूचना पाकर पहुंची पुलिस ने लिखा पढ़ी कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया ।

रिपोर्ट-मेराज शेख़ करारी कौशाम्बी।
मो.न.-8115771619

30 अप्रैल 2018

मौलाना सिब्ते हसन साहब मरहूम, हिंदो-पाक के पहले ख़तीब




मौलाना सिब्ते हसन साहब मरहूम 
बर्रे सग़ीर के पहले ख़तीब,
मुहर्रम में 
मरसिया,
सोज़,
सलाम,
रौज़ा ख्वानी को 
खिताबत में तब्दील करनेवाले ज़ाकिर
जिन्हों ने मजलिसे अजा में 
खिताबत के फन को राएज किया 





भाजपा के रोज़गार

मितरों... यह रोज़गार तो भाजपा के ही कारण प्राप्त हुआ है...


22 अप्रैल 2018

बहुत खतरनाक सोच


लखनऊ के अबिशेक मिश्र ने OLA टैक्सी इस लिए कैंसिल कर दी क्यूंकि ड्राईवर मुसलमान था.
और वोह अपना पैसा जेहादियों को नहीं देना चाहता था.
अभिषेक मुसलमानों को कोई पैगाम देना चाहता है. ये है भाजपा से जुड़े हुए लोगों की मानसिकता .......
क्या अपनी गाडी में खाड़ी देशों से आये पेट्रोल भरवाना बंद करदेगा अभिषेक?
अगर हम सब लोग इसी तरह सोचने लगेंगे तो यह देश अर्थ व्यवस्था के लिए बहुत नुकसान होगा.


20 अप्रैल 2018

पंडित के पास कोई जबाब नहीं था।

एक दिन पंडित को प्यास लगी, संयोगवश घर में पानी नहीं था। इसलिए उसकी पत्नी पड़ोस से पानी ले आई। पानी पीकर पंडित ने पूछा....
पंडित - कहाँ से लायी हो? बहुत ठंडा पानी है।
पत्नी - पड़ोस के कुम्हार के घर से।
(पंडित ने यह सुनकर लोटा फेंक दिया और उसके तेवर चढ़ गए। वह जोर-जोर से चीखने लगा )
पंडित - अरी तूने तो मेरा धर्म भ्रष्ट कर दिया। कुम्हार ( शूद्र ) के घर का पानी पिला दिया।
(पत्नी भय से थर-थर कांपने लगी)
उसने पण्डित से माफ़ी मांग ली।
पत्नी - अब ऐसी भूल नहीं होगी।
शाम को पण्डित जब खाना खाने बैठा तो घर में खाने के लिए कुछ नहीं था।
पंडित - रोटी नहीं बनाई। भाजी नहीं बनाई। क्यों????
पत्नी - बनायी तो थी। लेकिन अनाज पैदा करने वाला कुणबी(शूद्र) था और जिस कड़ाई में बनाया था, वो कड़ाई लोहार (शूद्र) के घर से आई थी। सब फेंक दिया।
पण्डित - तू पगली है क्या?? कहीं अनाज और कढ़ाई में भी छूत होती है?
यह कह कर पण्डित बोला- कि पानी तो ले आओ।
पत्नी - पानी तो नहीं है जी।
पण्डित - घड़े कहाँ गए???
पत्नी - वो तो मैंने फेंक दिए। क्योंकि कुम्हार के हाथ से बने थे।
पंडित बोला- दूध ही ले आओ। वही पीलूँगा।
पत्नी - दूध भी फेंक दिया जी। क्योंकि गाय को जिस नौकर ने दुहा था, वो तो नीची (शूद्र) जाति से था।
पंडित- हद कर दी तूने तो यह भी नहीं जानती की दूध में छूत नहीं लगती है।
पत्नी-यह कैसी छूत है जी, जो पानी में तो लगती है, परन्तु दूध में नहीं लगती।
(पंडित के मन में आया कि दीवार से सर फोड़ लूं)
वह गुर्रा कर बोला - तूने मुझे चौपट कर दिया है जा अब आंगन में खाट डाल दे मुझे अब नींद आ रही है।
पत्नी- खाट!!!! उसे तो मैनें तोड़ कर फेंक दिया है जी। क्योंकि उसे शूद्र (सुथार ) जात वाले ने बनाया था।
पंडित चीखा - वो फ़ूलों का हार तो लाओ। भगवान को चढ़ाऊंगा, ताकि तेरी अक्ल ठिकाने आये।
पत्नी - हार तो मैंने फेंक दिया। उसे माली (शूद्र) जाति के आदमी ने बनाया था।
पंडित चीखा- सब में आग लगा दो, घर में कुछ बचा भी हैं या नहीं।
पत्नी - हाँ यह घर बचा है, इसे अभी तोड़ना बाकी है। क्योंकि इसे भी तो पिछड़ी जाति के मजदूरों ने बनाया है।
पंडित के पास कोई जबाब नहीं था।
उसकी अक्ल तो ठिकाने आयी।
बाकी लोगों कि भी आ जायेगी।

10 अप्रैल 2018

खबरदार! होशियार!


अब भी वक्त है, आप घरों से निकल कर समाज के छोटे छोटे हिस्से को दंगाई बनाने के इस प्रोजेक्ट के खिलाफ आवाज़ उठाइये. बहुत देर हो चुकी है और यह देरी बढ़ती जा रही है. हर जगह एक भीड़ खड़ी है जिसे व्हाट्सएप के ज़रिए वीडियो और आडियो का इशारा मिलते ही वो दंगाई में बदल जाती है. हिन्दू मुस्लिम डिबेट के ज़रिए लोगों में बराबरी से ज़हर भरा गया है. अफवाह की एक चिंगारी भीड़ को किसी के मोहल्ले में ले जाती है और लूट-पाट से लेकर आगज़नी और हत्या कराने लगती है. हिन्दू-मुस्लिम डिबेट के केंद्र में है कि कैसे लगातार बहसों और प्रोपेगैंडा के ज़रिए आपके मन में मुसलमानों के प्रति नफ़रत भर दी जाए. इतनी भर दी जाए कि एक अफवाह भर से आप दंगा करने लग जाएं ताकि इल्ज़ाम भीड़ पर आए और नेता आपके बीच संत की तरह आता रहे. पूरा तंत्र लगा हुआ है वीडियो शेयर करने वाला.

19 मार्च 2018

होशियार मुसलमानो

होशियार मुसलमानो से ज़कात खैरात वसूलने के लिये पचास हजार RSS हिन्दु लडके दाडी बडा कर कुरता पाजामा और टोपी लागा कर घुम रहे है कई जगह पकडे भी गये है

ये लोग फरजी मदरसे खोल रहे हैं किराया पर और फरजी चन्दा कर रहे हैं आर एस एस के पलानिंग के तेहत मदरसों को बदनाम करने की शाजिश के तेहत ऐसा हो रहा है।

ईस लिये बगैर मदरसा देखे हरगिज कीसी को चन्दा ना दें।।बेनेकाब करने के लिये ईसे तमाम मुसलमानों मे फैलाये

वाह मोदी वाह

मोदी की वजह से सिर्फ 18 महीने के भीतर विश्व का सबसे 'विशाल' पार्टी कार्यालय का निर्माण करना सम्भव हो पाया।

आइये जरा इसकी खासियत भी अब जान लीजिए।

➖ 18 अगस्त 2016 को शिलान्यास हुआ और 18 फरवरी 2018 को उद्घाटन भी हो गया।

➖ 1,70,000 वर्ग फुट में फैली है जनता के खून पसीने की कमाई से बना यह विशालकाय इमारत।

➖ पार्टी महासचिवों के अय्याशी के लिए, इसमें 70 अलग-अलग कमरे हैं।

➖ सबसे ऊपरी मंजिल पर 50 हजार से 80 करोड़ कमाने वाले जय शाह के पिता... अमित शाह बैठेंगे, जहाँ से पूरा कॉम्प्लेक्स दिखाई देगा।

➖ नयी इमारत में 20 हज़ार IT Cell के दलालों के बैठने की व्यवस्था की गयी है।

➖ यहाँ एक प्रिंटिंग प्रेस भी होगा जिसमें विरोधियों के खिलाफ पुस्तकें छापने की और फेंक फोटोशॉप  बनाने की व्यवस्था हे 

➖ देशभर में फैले.... आरएसएस, बजरंग दल, तथा NDA के अन्य सभी घटकों से, एक साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के द्वारा लाइव संवाद किया जा सकेगा।

➖ विरोधियों द्वारा अपेक्षित प्रदर्शन से निपटने के लिये, यहां हर तरह के अस्त्र- सस्त्र आधुनिक हथियार इस भवन में रखा गया है।

▪और सबसे महत्वपूर्व बात जनता के लिए आवास 2022 में बनेगा.
▪ 100 स्मार्ट सिटी 2022 में बनेगा।
▪ महंगाई 2022 में कम होगी।
▪ दिन दहाड़े लूट पाट, छीना झपटी 2022 से कम होंगे।
▪ पेट्रोल डीज़ल 2022 से सस्ते होंगे।
▪ आतंकवाद 2022 में खत्म होगा।
▪ किसान आत्महत्या 2022 से बंद होगी।
▪ भ्रस्टाचार 2022 से खत्म होगा।
▪ मंदिर भी 2022 में ही बनेगा।

            अरबों की लागत से भाजपा  का मुख्यालय बनकर तैयार हो गया। अब पूछो कितने AIIMS या नए कॉलेज बने?
तो कहते हैं कि 70 साल के गड्ढे भरने में वक्त लगेगा 😈

  यह 7 मंज़िला इमारत है जो
किसी भी पोलिटिकल पार्टी का सबसे बड़ा कार्यालय है।

05 महीनों में बीजेपी को 80,000 हज़ार करोड़ का चंदा मिला है,----
ये चंदा किसने दिया क्या किसी को पता है ??

🙈🙉🙊

04 फ़रवरी 2017

Majlis e Tarheem marhum Zameer Abbas

सनीचर 4 February को सगीर bhai के घर मीरा रोड में मजलिस है.
खेतआब मौलाना अब्बास आलम करेंगे