16 जनवरी 2012
14 जनवरी 2012
मरहूम सय्यद गुलाम पंजतन इब्ने काजिम हुसैन का चेहलुम
परसों यानी पीर 16 जनवरी को करारी शरीफाबाद में मरहूम सय्यद गुलाम पंजतन के चेहलुम की मजलिस होगी जिसमें मौलाना सय्यद हसनैन रिज़वी करारवी खिताबत फ़रमाएंगे.
यह मजलिस सुबह 10 बजे कुरआन खानी के बाद शुरू होगी.
आप से शिरकत की दरखास्त है. अगर आप किसी वजह से शरीक न हो सकें तो कम अज कम एक सुरह फातेहा से मरहूम को याद करें.
तफसील के लिए मरहूम के फरजंद शबीहुल काजिम से राबेता 9860451686 किया जा सकता है.
13 जनवरी 2012
11 जनवरी 2012
हवाई जहाज़ में अज़ादारी
ज़माना तुम्हें अच्छा समझे
10 जनवरी 2012
दोस्ती करना और निभाना
09 जनवरी 2012
इमामबाडा चौधरी कादिर अली से 18 ताबूत बरामद होंगे
26 जनवरी को करारी के इमामबाडा चौधरी कादिर अली से 18 ताबूत बरामद होंगे.
18 ताबूत बरामद होने का यह दूसरा साल है.
वक़्त है 9 बजे सुबह.
यह ताबूत मुस्लिम यूथ कमिटी की जानिब से निकला जाता है.
आप अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ ज़रूर शरीक हों और जनाबे फातेमा ज़हरा (स.अ.) को उनके लाल का पुरसा दें.
मजीद मालूमात के लिए 9839515958 राबेता किया जा सकता है.
07 जनवरी 2012
06 जनवरी 2012
04 जनवरी 2012
मलाड मुंबई में मरहूम हामिद रिज़वी के ईसाले सवाब की मजलिस
कल रात मलाड मालोनी में मरहूम हामिद रिज़वी इब्ने मोहम्मद तकी के ईसाले सवाब के लिए महफिले मुहिब्बाने हुसैन में एक मजलिस का इनेकाद किया गया.
मौलाना रहमान अली रूहानी ने जाकरी फरमाई.
मजलिस के बाद मरहूम की याद में दो नौहे पढ़े गए जिसे मरहूम बड़ी ख़ूबसूरती से पढ़ा करते थे और जिस पर ज़ोरदार मातम हुआ करता था. वोह थे "लाचार हुसैना" और "ख़ाक पे बीबी न सो, बाली सकीना उठो".
इस मजलिसो मातम का एहतिमाम अंजुमने मुहाफ़िज़े इस्लाम, इलाहबाद ने किया था.
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करारी करबला में परचमे अब्बास
01 जनवरी 2012
आ नए साल बता कैसे मुबारक मैं कहूँ ??
आ नए साल बता कैसे मुबारक मैं कहूँ ??
लाश शब्बीर की मकतल में पड़ी है अब भी
मेरी आँखों में अभी शाम के कैदी हैं बसे
सहन में मेरे अभी शामे गरीबाँ की सियाही है बिछी
मेरा मलबूस तो देख अब भी सोगवार हूँ मैं ,
देख मातम में है सारा यह कबीला मेरा ..
आ नए साल बता तू ही बता दे मुझको ,
क्या कहूँ? कैसे मैं खुश रंग क़बा को ओढ़ूँ ?
ख़ाक ओढ़े अभी कोनें की शहजादी है ..
सरे मजलूम सिना पर है तिलावत करता ,
कोई बीमार जो माँ बहनों की चादर पे लहू रोता है ,
कैसे उसको मैं बताऊँ के तू फिर आया है ..
जो के ज़िन्दान में लम्हों को गिना करती है ??
वो यातीमान के जो ढलती हुई शामों में परिंदों का पता पूछती है ?
आ नए साल बता रंग भरूँ कोनसा मैं ?
वोह जो सुर्खी सरे अफ्लाक है खूने दिल की ?
या सियाही जो सरे शामे गरीबां फैली ?
या सफैदी जो किसी बीमार के बालों में उतर आई है ?
आ नए साल की रानाई चली जा के यहाँ
मातमी लोग हैं और ,
बिखरे है मिटटी पे गुलाब ..
बैन करती हुई पियासों पे ग़मज़दा आँखें ..
अपने पियारों को बनाए है सदका शेह का ,
माओं बहनों की सिसकती हुई ज़ख़्मी आँखें ..
तुझ से हो पाए तो बस काम यह इतना कर दे ..
खून का रंग फ़क़त अपनी क़बा से धो दे!!!
हामिद चचा का एक यादगार विडियो
इस विडियो में:
करारी में मुहर्रम 2009 में हामिद चचा बॉम्बे वालों को मरसिया पढने का फन समझाते हुए और एक गैर मुस्लिम खातून मरसिया निगार का कलाम सुनाते हुए. चूँकि यह विडियो मोबाइल से बनाया गया है इस लिए quality खराब है.
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मरहूम सय्यद मोहम्मद हामिद की मजालिसे तरहीम
मरहूम सय्यद मोहम्मद हामिद के ईसाले सवाब के लिए 26 , 27 और 28 जनवरी को मजालिसे तरहीम का सिलसिला इलाहबाद की काजी जी की मस्जिद में रखा गया है.
26 जनवरी को काजी जी की मस्जिद में मौलाना कसरे सुलतान साहब खिताब फ़रमाएंगे,
27 जनवरी को मौलाना रज़ी हैदर साहब मजलिस पढ़े गे और
28 जनवरी को मौलाना एहसान हैदर जवादी साहब जाकिरी फ़रमाएंगे.
आप लोगों से ज्यादा से ज्यादा तादाद में शिरकत की गुज़ारिश है.
तफसील के लिए जनाब मोख्तार साहब से 081276553123 पर राबता किया जा सकता है.
26 जनवरी को काजी जी की मस्जिद में मौलाना कसरे सुलतान साहब खिताब फ़रमाएंगे,
27 जनवरी को मौलाना रज़ी हैदर साहब मजलिस पढ़े गे और
28 जनवरी को मौलाना एहसान हैदर जवादी साहब जाकिरी फ़रमाएंगे.
आप लोगों से ज्यादा से ज्यादा तादाद में शिरकत की गुज़ारिश है.
तफसील के लिए जनाब मोख्तार साहब से 081276553123 पर राबता किया जा सकता है.
31 दिसंबर 2011
अंजुमन का नाम और बैंक अकाउंट नंबर
करारी की 8 रबीउल अव्वल का जुलूसे अमारी आलमी पैमाने पर शोहरत हासिल कर रही है. लोग तमन्ना रखते हैं के काश वोह भी इस तकरीब में हाज़िर होते और नौहाओ मातम में शरीक होते.
करारी से दूर रहने वाले अफराद ऐसे भी हैं जो पहले से छुट्टी की दरखास्त दे देते हैं और ट्रेन में अपनी सीट बुक करवालेते हैं.
यह मोहब्बते इमाम हुसैन (अ.स.) है. और साथ ही अपने वतन की सरज़मीन से लगाओ.
इसी लिए अंजुमने अस्गरिया, करारी, जो इस जुलूस का एहतेमाम करती है, ने फैसला किया है की जो मोमिन इस जुलूसे अमारी में ज़ाहेरी तौर पर शिरकत न कर सकता हो वोह कम से कम अंजुमन को माली तौर पर मदद कर सके.
अंजुमन का नाम और बैंक अकाउंट नंबर दिया जा रहा है ता के वोह भी इस कारे खैर में हिस्सा ले सकें.
ANJUMAN-E-ASGARIYA
Bank of Baroda, Karari,
a/c no. 29710100010712
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IFSC - B A R B 0 - KARARI
Kaushambi (U.P.) INDIA
For detail contact: Babban bhai, Mobile: 09792634198
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30 दिसंबर 2011
आह! हामिद चचा
यह मरसिया "इल्मो अमल" के उन्वान से मरहूम सय्यद मोहम्मद हामिद रिज़वी ने मरहूम वालिदे अल्लाम सय्यद गुलाम हसनैन करारवी के चेहलुम पर करारी शिया जामे मस्जिद में पढ़ा था.
यह मरसिया मशहूर मरसिया निगार जनाब उम्मीद फाजली का है. जिस खूबसूरत अंदाज़ से हामिद चचा मरहूम ने पढ़ा है वोह काम उम्मीद फाजली खुद न कर सके.
वालिदे अल्लाम का चेहलुम फ़रवरी 1996 में हुवा था.
मरसिया सुनने के बाद मरहूम को सुरे फातेहा से नवाजना न भूलें और आज नमाज़े वहशत पढना फरामोश न करें.
तद्फीन आज दर्याबाद, इलाहाबाद में शाम साढे 4 बजे के आस पास होगी.
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सय्यद मोहम्मद हामिद रिज़वी साहब का इन्तेकाल
29 दिसंबर 2011
दुआ की Urgent दरखास्त
हामिद चचा की तबियत कुछ ज्यादा सिरिअस होगई है.
आप लोग उनकी सेहत के लिए " अम्मैं योजीबुल मुज्तर्रा इजा दआ हो व यक्षेफुस सू " पढ़ें.
वह इलाहबाद में ICU में दाखिल हैं और घर के तमाम अफराद उनके पास मोजूद हैं.
आप लोग उनकी सेहत के लिए " अम्मैं योजीबुल मुज्तर्रा इजा दआ हो व यक्षेफुस सू " पढ़ें.
वह इलाहबाद में ICU में दाखिल हैं और घर के तमाम अफराद उनके पास मोजूद हैं.
28 दिसंबर 2011
24 दिसंबर 2011
क्या आप आठ रबीउल अव्वल के जुलूस के लिए तैयार हैं?
जो मोमिनीन दूर दराज़ से जुलूसे अमारी में शिरकत के लिए करारी आना चाहते हैं वोह अपना रिज़र्वेशन करवा लें. अल्लाहाबाद में कुम्भ मेले की आमद है.
यह याद रहे की जुलूसे अमारी का प्रोग्राम सफ़र महीने के 29 के चाँद के मुताबिक होता है.
मौसम में ठंडक के आसार इस साल ज्यादा होंगे, लिहाज़ा गर्म कपडे के एहतिमाम के साथ करारी तशरीफ़ लाएं.
22 दिसंबर 2011
मुंबई के बांद्र पूर्व इलाके में 25 मुहर्रम के मौके पर जुलूसे अजा
25 मुहर्रम को चौथे इमाम, हज़रत इमाम अली इब्निल हुसैन, जो सय्येदुस साजेदीन और जैनुल आबेदीन के लक़ब से जाने जाते हैं की शहादत के मौके पर बांद्रा के खेरवाडी इलाके से नमाज़े मग्रेबैन पढ़ कर उनकी याद में एक जुलूसे अजा बरामद हुआ. पहली मजलिस मौलाना जाकी साहब ने पढ़ी और आखरी मजलिस मौलाना हसनैन करारवी ने. निजामत के फराएज़ जनाब उम्मीद आज़मी ने अंजाम दिए
| मौलाना ज़की साहब पहली मजलिस पढ़ते हुए. |
| उम्मीद आज़मी साहब निजामत करते हुए. |
विडिओ में आखरी मजलिस से पहले हसन इलाहाबादी अपना नजराने अकीदत पेश करते हुए.
18 दिसंबर 2011
12 दिसंबर 2011
करारी के ओलामा के खिलाफ साज़िश का पर्दा फाश
करारी में चंद शरपसंद अनासिर, फासिक और बेदीन अफराद ने करारी के ओलामा को बदनाम करने की साजिश रची थी जिस का पर्दा फाश हो गया.
एक जय्यिद और बुज़ुर्ग आलिम दीन के नाम से मुहर्रम से पहले एक परचा छपवाया. इस परचे में महीनी यह थी के इसमें पहले करारी में निकलने वाले जुलूस की फेहरिस्त थी और आखिर में एक नोट लगी हुई थी.
यह नोट करारी के एक बुज़ुर्ग आलिम की तरफ मंसूब थी. इस आलिम के पीछे बहुत दिन से लोग ताक में लगे थे क्यूंकि यह मिम्बर पर अक्सर हक और खरी खरी बात करता था. मिम्बर से हक बात कहने में अपनी औलाद को भी नहीं बख्शा.
नीचे दर्ज अहेम नुक्तों ने इन शर पसंद अफराद की साज़िश को बेनकाब करदिया.
1 - इस आलिम के Rizvi खानदान से इतने अच्छे ताल्लुकात थे (9 मुहर्रम की रिज़वी कॉलेज की मजलिस इन्हीं से पढवाई जाती है) की अगर उन्हें इतनी बड़ी बात कहनी होती तो पहले वोह राबता करते और तस्दीक करते. इसी 9 मुहर्रम को वोह खुश अख्लाकी से कॉलेज के बंगले पर मिले.
2 - दूसरा यह इतना बुज़ुर्ग आलिम जो हव्ज़ाए इल्मिया से Retire हुआ हो और अपनी ज़िन्दगी दरसे अखलाक देने में गुजारी हो वोह कभी इतनी ओछी, पस्त और गिरी हुई बात नहीं कर सकता. इस आलिमे दीन को पता है किसी इलाके में रहने वाला अगर अपनी बस्ती के जुलूस या मजलिस के बारे में जानकारी नहीं रखता तो वोह कोई ऐब नहीं है. बहुत से अफराद ऐसे हैं जो शहरों में रहते हैं और अपनी बस्ती की तफ्सीलात नहीं जानते, लेकिन अपने इलाके से जुड़े हुए हैं और अपनी बस्ती की तरक्की के लिए अस्पताल, स्कूल और कॉलेज तामीर करने के काम करते हैं जिस से लोग अपना निजी फ़ाएदा भी उठाते हैं और चंदा भी ले जाते हैं.
3 - सब से बड़ी दलील इस परचे के पीछे मुजरिमाना ज़िन्दगी गुज़ारने वालों की यह है के उन्हों ने ऐसे आलिमे दीन के नाम से मंसूब किया है जिसने अपनी दीनी तालीम लखनऊ या बनारस में नहीं हासिल की बल्कि नजफे अशरफ के बड़े बड़े अयातुल्लाह और मराजे किराम से दरस हासिल किया. और यह आलिमे दीन इतनी बात ज़रूर जानता है की अपनी बस्ती के मुहर्रम की मजलिस और जुलूस की तफ्सीलात न जान्ने वाला "शिय्यत से खारिज" नहीं हो सकता, क्यूंकि यह अक्ल और शरीअत के मनाफ़ी है.
4 - यह भी जानकार आप लोगों को हैरत होगी की इस handbill को जिस आलिमे दीन से मंसूब किया उसके नाम के साथ उसकी दस्तखत (signature ) भी नहीं है. बिला दस्तखत कोई भी परचा किसी रद्दी की जीनत ही बन सकता है.
एक जय्यिद और बुज़ुर्ग आलिम दीन के नाम से मुहर्रम से पहले एक परचा छपवाया. इस परचे में महीनी यह थी के इसमें पहले करारी में निकलने वाले जुलूस की फेहरिस्त थी और आखिर में एक नोट लगी हुई थी.
यह नोट करारी के एक बुज़ुर्ग आलिम की तरफ मंसूब थी. इस आलिम के पीछे बहुत दिन से लोग ताक में लगे थे क्यूंकि यह मिम्बर पर अक्सर हक और खरी खरी बात करता था. मिम्बर से हक बात कहने में अपनी औलाद को भी नहीं बख्शा.
नीचे दर्ज अहेम नुक्तों ने इन शर पसंद अफराद की साज़िश को बेनकाब करदिया.
1 - इस आलिम के Rizvi खानदान से इतने अच्छे ताल्लुकात थे (9 मुहर्रम की रिज़वी कॉलेज की मजलिस इन्हीं से पढवाई जाती है) की अगर उन्हें इतनी बड़ी बात कहनी होती तो पहले वोह राबता करते और तस्दीक करते. इसी 9 मुहर्रम को वोह खुश अख्लाकी से कॉलेज के बंगले पर मिले.
2 - दूसरा यह इतना बुज़ुर्ग आलिम जो हव्ज़ाए इल्मिया से Retire हुआ हो और अपनी ज़िन्दगी दरसे अखलाक देने में गुजारी हो वोह कभी इतनी ओछी, पस्त और गिरी हुई बात नहीं कर सकता. इस आलिमे दीन को पता है किसी इलाके में रहने वाला अगर अपनी बस्ती के जुलूस या मजलिस के बारे में जानकारी नहीं रखता तो वोह कोई ऐब नहीं है. बहुत से अफराद ऐसे हैं जो शहरों में रहते हैं और अपनी बस्ती की तफ्सीलात नहीं जानते, लेकिन अपने इलाके से जुड़े हुए हैं और अपनी बस्ती की तरक्की के लिए अस्पताल, स्कूल और कॉलेज तामीर करने के काम करते हैं जिस से लोग अपना निजी फ़ाएदा भी उठाते हैं और चंदा भी ले जाते हैं.
3 - सब से बड़ी दलील इस परचे के पीछे मुजरिमाना ज़िन्दगी गुज़ारने वालों की यह है के उन्हों ने ऐसे आलिमे दीन के नाम से मंसूब किया है जिसने अपनी दीनी तालीम लखनऊ या बनारस में नहीं हासिल की बल्कि नजफे अशरफ के बड़े बड़े अयातुल्लाह और मराजे किराम से दरस हासिल किया. और यह आलिमे दीन इतनी बात ज़रूर जानता है की अपनी बस्ती के मुहर्रम की मजलिस और जुलूस की तफ्सीलात न जान्ने वाला "शिय्यत से खारिज" नहीं हो सकता, क्यूंकि यह अक्ल और शरीअत के मनाफ़ी है.
4 - यह भी जानकार आप लोगों को हैरत होगी की इस handbill को जिस आलिमे दीन से मंसूब किया उसके नाम के साथ उसकी दस्तखत (signature ) भी नहीं है. बिला दस्तखत कोई भी परचा किसी रद्दी की जीनत ही बन सकता है.
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| शरपसंदों की तरफ से करारी तकसीम किया गया परचा. |
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