.15 अप्रैल से 13 मई 2011 तक की तस्वीरें
30 मई 2011
29 मई 2011
24 मई 2011
विलादते जनाबे फातेमा ज़हरा मुबारक
तज़किरा फ़ातेमा ज़हरा का ज़रा हो जाए
क्या हकीकत है ज़माने को बयां हो जाए
उस से अल्लाहो -नबी हो नहीं सकते राज़ी
जिस से शेह्ज़ादिए-कौनेन ख़फा हो जाए
21 मई 2011
सय्यद सफी हैदर इन्तेकाल कर गए
आज शाम करेली, इलाहाबाद में सय्यद सफी हैदर रिज़वी ने इस दुनियाए फानी को खैरबाद कहा और अबदी दुनिया को कूच किया. मरहूम 80 साल से ज्यादा जिए. आप का ताल्लुक करारी से मिला हुआ गाँव अग्योना था. मरहूम ने शरीके हयात के साथ साथ दो लड़कियां और एक फरजंद को दाग़े मुफारेक़त दिया. अल्लाह उनके पस्मान्दगान को सब्र अता करे.
सफी हैदर साहब ने बहुत ही सादा ज़िन्दगी गुज़ारी. एक मुद्दत से बीमार रहने के बाद आज दाइए अजल को लब्बैक कहा. इलाहबाद शहर के दर्याबाद के कब्रस्तान में कल इंशा अल्लाह सुबह नौ बजे तद्फीन होगी.
आप से एक सुरह फातेहा की दरख्वास्त है.
19 मई 2011
हवाई जहाज़ का सस्ता किराया और मुश्किल सफ़र
ज़ियारत के लिए आमादा होने पर इस बात का ख़याल रहे की सफ़र की परेशानियां सामने आएंगी. लोग लम्बी दूरी के सफ़र से घबरा जाते हैं.
बम्बई या देहली से शाम पहुंचना काफी थका देने वाला सफ़र होता है. अगर सउदी एरलाईन्स से टिकट है तो खाने पीने की परेशानी न होगी, लेकिन अगर सस्ती एरलाईन्स, अल अरेबिया से जाना है तो बहुत दिक्कत पेश आती है. क्यूंकि अल अरेबिया का सस्ता टिकट होने की वजह से जहाज़ में नाश्ता और खाना नहीं दिया जाता. यहाँ तक की जहाज़ में पानी भी खरीद कर पीना पड़ता है. एक बोतल पानी 40 रूपए में. देह्शत्गर्दों के डर से मुसाफिर को जहाज़ में अपने साथ पानी ले जाने की भी इजाज़त नहीं है.
अगर हवाई जहाज़ किसी वजह से ताखीर से आए या जाए तो मुसाफिर को या तो भूका रहना पड़ेगा या फिर महंगा खाना पीना खरीदना पड़ेगा. यह दिक्क़तें न आएं अगर जहाज़ दिल्ली या बम्बई से सीधा शाम पहुंचे. लेकिन ऐसी कोई परवाज़ नहीं है. उम्मुल मसाएब, जनाबे जैनब (अ.स.) की ज़ियारत करने जा रहे हैं तो परेशानियों से घबराना कैसा?
18 मई 2011
बम्बई से शाम के लिए रवानगी
| होटल बिनाए कासिम में |
खलीज की सब से अच्छी हवाई सेवा सउदी एरलाइन्स की मानी जाती है. लेकिन शाम (सिरिया) जाने के लिए कोई सीधी परवाज़ नहीं है. बम्बई से रियाज़ और रियाज़ से दमिश्क जाना पड़ता है. रियाज़ में 4 घंटा हवाई अड्डे पर इंतज़ार कर के कुल नौ घंटे में आप बम्बई से दमिश्क पहुँच जायेंगे.
इत्तेफाक से सउदी अरब के मदीना और दीगर शहरों में रेतीले तूफ़ान की वजह से 15 अप्रैल को सुबह 7 बजे बम्बई हवाई अड्डे से उड़ने वाला जहाज़ 18 घंटे देर से उड़ा. रियाज़ हवाई अड्डे पर 10 घंटे कियाम करने के बाद हम लोग दमिश्क शाम 7 बजे पहुंचे और सय्यदः जैनब शहर के होटल "बिनाए कासिम" में रात 9 बजे सामान रखा. होटल जनाबे ज़ैनब के रौज़े के पिछवाड़े ही था. चूँकि रौज़ा रात 10 बजे बंद हो जाता है इस लिए हम लोग खा पीकर सो गए और जियारत दुसरे रोज़ पर टाल दी. इस ताखीर से हमारा एक दिन ज़ाए हुआ.
17 मई 2011
वतन वापसी
| नजफ़ में रौज़ाए हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) |
शाम, ईराक और ईरान की ज़ियारात अपने इख्तिताम पर आई. 28 दिनों का यह टूर निहाएत ही कामयाब रहा. तीनो ममालिक में मौसम बहुत ही शानदार था. अप्रैल के दुसरे हफ्ते से मई के दुसरे हफ्ते में मौसम बहुत ही प्यारा रहता है, वरना मई के तीसरे हफ्ते से गर्मी शुरू हो जाती है. मौसम से परेशानी का एहसास खुसूसन ईराक में होता है. वहाँ बिजली हर दो घंटे के बाद चार घंटे गाएब रहती है, इस तरह 24 घंटों में सिर्फ 8 घंटा बिजली की सप्लाई रहती है. अक्सर होटल बिजली आने पर ही AC चलाते हैं, वरना जेनेरटर के ज़रिए सिर्फ पंखा चल सकता है.
यह मसअला पूरे ईराक में है. हम लोगों ने जब सरज़मीने नजफ़ पर क़दम रखा तो मग़रिब की अज़ान होने वाली थी और उस वक़्त बिजली नहीं थी. पूरा शहर जेनेरटर की आवाज़ से गूँज रहा था. चार बरसों में नजफ़ काफी तब्दील हो चुका था. सिकुरिटी बहुत सख्त थी. हालात को देखते हुए ज़रूरी भी था. शारे रसूल पर होटल शिक़ाकुल ईमान में तीन रोज़ कियाम करना था. यह होटल उसी सड़क पर वाके है जहां अयातुल्लाह सीस्तानी साहब का दफ्तर है.
शाम से तकरीबन 30 घंटे के बस के सफ़र के बाद हिम्मत नहीं हुई की उसी शब् अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) के रौज़े पर हाजरी देते. रात के 11 बज रहे थे और रौज़ा 12 बजे बंद हो जाता है.
21 अप्रैल 2011
शाम में मौजूद हैं
सीरिया में आज पांचवां और आखरी दिन है. मौसम अच्छा है मगर हालात ठीक नहीं हैं. जोर्डन की सरहद पैर बसे शहरों में वहाबियों ने फसाद फैला रखा है. सय्येदा जैनब जहाँ जनाबे जैनब का रौज़ा है वहां फिल वक़्त हालात बेहतर हैं. हमारा काफ़ला हर जगह जियारत के लिए जा सका. हज़रात हाबील की कब्र, असहाबे कहेफ से मंसूब ग़ार, सुकैना बीनते अली इब्ने अबी तालिब का रौज़ा, हज़रत रोक़य्या, दरबारे शाम. वगैरा, आज कर्बला के लिए रवाना होंगे. इंशा अल्लाह. करारी के ओलामा से मुलाक़ात हुई. अग्यौना के मोहम्मद काजिम , करारी के रेहान, लहना के मौलाना. वगैरा. सब बहुत खुश हुए और अहले वतन की खिअरियत दरयाफ्त करने लगे.
15 अप्रैल 2011
10 अप्रैल 2011
01 अप्रैल 2011
मदीना, हर मुसलमान के दिल की तमन्ना
हज 2009 के दौरान मदीनातुर रसूल में खींची गई तस्वीरें
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29 मार्च 2011
महफिले सक्काए सकीना में मजलिस
गुज़िश्ता इतवार 27 मार्च को मीरा रोड मुंबई में मरहूम एहसान फातेमा का चेहलुम मुनाकिद हुआ जिस में मौलाना सय्यद हसनैन करारवी ने खेताबत फ़रमाई. यह मजलिस महफिले सक्काए सकीना में थी.
नीचे विडियो में उस मजलिस का एक हिस्सा दिखाया गया है.
26 मार्च 2011
बनी हाशिम का कब्रस्तान, वादिस सलाम
यह तस्वीरें करारी में बनी हाशिम का कब्रस्तान, वादिस सलाम की हैं. गुज़िश्ता मुहर्रम (1432 ) 2010 में इस कब्रस्तान में 12 मुहर्रम को मौलाना रज़ा हैदर साहब ने मरहूम सय्यद ग़ुलाम हसनैन करार्वी के कब्र के सरहाने मजलिस पढ़ी थी .
22 मार्च 2011
मरहूम मौलाना हैदर महदी साहब का चेहलुम
"तनजीमुल मकातिब के इख्तेलाफात का पहला शिकार?" हुसैन भाई अपनी डाएरी में शाएद यही दर्ज कर रहे हैं.
मरहूम मौलाना हैदर महदी साहब के चेहलुम पर ली गई मज़ीद तस्वीरों को देखने के लिए click करें
21 मार्च 2011
मजलिसे चेहलुम
मरहूमा सय्यादा एहसान फातेमा बिन्ते सय्यद अफसर हुसैन का चेहलुम 27 मार्च को मुंबई के मीरा रोड में महफिले सक्काए सकीना, सुपर मार्किट के करीब, में मुनाकिद होगा जिसमें मौलाना सय्यद हसनैन रिज़वी करार्वी खिताबत फ़रमाएंगे. सुब्ह 10 बजे कुरआन ख्वानी होगी और 11 बजे मजलिसे अज़ा होगी. आप लोगों की शिरकत ग़मज़दा अहले खाना के तसकीने क़ल्ब का बाइस होगी.
औरतों के लिए मजलिस में अलग से इंतज़ाम होगा.
सोगवार: सय्यद ऐनुल अब्बास. फोन: 9819168455
18 मार्च 2011
रज़ा रिज़वी (शीलू) की वालेदा की बरसी की मजलिस
मरहूमा सय्यदा हुसैन फ़ातेमा बिन्ते मरहूम सय्यद नफीसुल हसन (भुग्गी बाबा) की बरसी की मजलिस कल इलाहाबाद में काजी जी की मस्जिद में नमाज़े मग्रबैन की नमाज़ के बाद हुई. मरहूमा के दो फरजंद हैं. शीलू (रज़ा रिज़वी ) और जिया रिज़वी (शेरू). मरहूमा के ईसाले सवाब के लिए एक सुरह फातेहा की दरख्वास्त है.
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14 मार्च 2011
उमरह रवानगी
| Hajare Aswad, Hajj 2009 |
मरहूम बेच्चन बाबा के फ़रज़न्द मौलाना मोहम्मद अख्तर रिज़वी मए कहारी और मए पिसरान आज सुबह उमरह करने के लिए बम्बई से जद्दाह के लिए रवाना हो गए. दो हफ़्तों का यह टूर मदीना और मक्काह का है. अल्लाह तआला इनकी ज़ियारात और उमरह को कामयाब करे.
तकरीबन दो बरसों से उमरह बजा लाने का रुझान मोमिनीन के दरमियान में इजाफा हुआ है. ख़ास तौर पर मार्च और अप्रैल के महीनों में. इस मौसम में सिर्फ 35 हज़ार रोप्यों में उमरह मोकम्मल हो जाता है. जब की हज्ज अदा करने के लिए एक लाख सत्तर हज़ार का खर्च बैठता है. खोदा तमाम हज्ज, उमरह और जियारत की तमन्ना रखने वालों को मुशर्रफ करे. आमीन.
08 मार्च 2011
शाम-ईराक-ईरान की ज़ियारात
शाम-ईराक-ईरान की ज़ियारात.
काफ्ला 14 अप्रैल को रवाना होगा.
सिर्फ 55,000 /- . कुल 28 दिन.
राबता करें: 09920276708
05 मार्च 2011
मरहूम असग़र अब्बास के ईसाले सवाब की मजलिस
आज मुंबई के कुर्ला के नज़र अली इमामबाड़े में मरहूम असग़र अब्बास (छोक्कन भाई) के ईसाले सवाब के लिए मजलिसे अजा का इनेकाद बाद नमाज़े मग़रिब किया गया है. मरहूम का इन्तेकाल 2 मार्च 2011 को हुआ था. इस मजलिस को मौलाना सय्यद हसनैन करार्वी खेताब करेंगे.
आप लोगों से शिरकत की गुज़ारिश है. मज़ीद मालूमात के लिए पापा (ज़फर) से राबता इस नं 9969425157 पर किया जा सकता है.
04 मार्च 2011
मरहूम मंज़ूर हसन रिज़वी की बीसवीं बरसी
मरहूम मंज़ूर हसन रिज़वी इब्ने अख्तर हुसैन की कल 29 रबीउल अव्वल को बीसवीं बरसी है. मरहूम हमारे नाना थे. उनके 6 बेटे और 5 बेटियाँ थीं जिसमें 4 फरजंद और 3 दुखतर हयात हैं. सबसे बड़े फरजंद मरहूम महमूद सरोश 13 साल पहले इन्तेकाल कर गए, वोह एक जाने माने शाएर थे. उनसे छोटे याकूब हसन रिज़वी तकरीबन 24 साल पहले सड़क हादसे का शिकार हो गए थे.
डाक्टर अख्तर हसन रिज़वी उनके पांचवें फरजंद हैं जिनका शुमार मुल्क के मशहूर बिल्डर माने जाते हैं. साथ ही उनहूँ ने तालीमी मैदान में खिदमात अंजाम देकर अपना और अपने वालेदैन का नाम रोशन किया है. जौनपुर का कालिज, बम्बई में रिज़वी कॉलेज और करारी में एक बहुत ही बड़ा कॉलेज उनकी ही काविशों का नतीएजा है.
मरहूम मंज़ूर हसन रिज़वी ने अपनी ज़िन्दगी का एक बड़ा हिस्सा बम्बई में गुज़ारा और रिटायर होने के बाद करारी में रहने लगे. बागबानी का बहुत शौक़ था. पेड़ पौदों से दिलचस्पी थी. अमरुद और आम के बाग़ में बराबर हाजरी देते.
अपनी सेहत का ख्याल रखते, तकरीबन सौ साल जिए लेकिन कमर नहीं झुकी. तबियत ज़रा सी नासाज़ होती तो खाने पर रोक लगा देते. पेट खराब होने न देते और रोज़ नहार मुंह 'निम्कौरी' फांकते थे.
हर नमाज़ का खात्मा अपनी औलाद के लिए बा आवाज़ बुलंद देर तक दुआ करते, हर एक बेटा बेटी का नाम लेले कर दुआ करते.
शाएर अकबर इलाहाबादी के अशआर ज़बानी याद थे और हमेशा उन्हें पढ़ा करते थे. हाफेज़ा तेज़ था, सिर्फ बीनाई ज़रा कमज़ोर हो गई थी. कभी परेशान दिखाई नहीं दिए. हर हाल में मूतमइन नज़र आते.
अल्लाह ताआला उनके दरजात में बुलंदी अता करे. एक सूरा फातेहा से मरहूम को नवाज़ने की गुजारिश है.
03 मार्च 2011
आज तालाब्पर में छोक्कन भाई सिपुर्दे ख़ाक
असगर अब्बास ( छोक्कन ) इब्ने ज़व्वार हुसैन का कल 11 .00 बजे दिन में इलाहबाद के अस्पताल में इन्तेकाल हो गया था. आज तकरीबन 11 .00 बजे दिन में तालाब्पर में उनकी तद्फीन हो गई. मरहूम के दो फ़रज़न्द हैं. छोक्कन भाई बहुत ही खुश मिज़ाज थे. अक्सर मजालिस में सोज़ खानी किया करते थे. अल्लाह ताआला उन्हें जवारे मासूमीन में जगह अता करे.
आप से सुरह फातेहा की दरख्वास्त है. और साथ ही मगरिब की नमाज़ के बाद नमाज़े वहशत पढना न भूलें.
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23 फ़रवरी 2011
Architect का नौहा
शम्सुल रिज़वी, एक कामयाब architect ही नहीं बल्कि एक अच्छे नौहा खान भी हैं. आप जनाब वजीर हैदर रिज़वी ( Kobe ) के छोटे फरजंद. अपने गाँव अन्डेहरा से बेहद लगाओ है. एक ख़ूबसूरत इमामबाडा भी बनवाया है. हर साल मुहर्रम के पहले अश्रे में वहीँ मओजूद रहते हैं.
जनाब अबू तालिब (अ.स.) के सिलसिले में एतेराज़ात पर जवाब देते हुए एक किताब "बोहतान" के नाम से तरतीब दी है.
यह विडियो बम्बई में सफ़र के महीने में अँधेरी में मुनाकिद एक मजलिसे अज़ा में नौहा पढ़ते हुए का है.
21 फ़रवरी 2011
हज़रत मोहम्मद मुस्तफा (स.अ.) और हज़रत इमाम सादिक़ (अ.स.) की यौमे पैदाइश
19 फ़रवरी 2011
18 फ़रवरी 2011
17 फ़रवरी 2011
हाई ब्लड प्रेशर और शुगर दो खतरनाक बीमारियाँ
कल बुध को मरहूमाँ एहसान फातेमा बिन्ते अफसर हुसैन की तद्फीन मीरा रोड, बम्बई , के कब्रस्तान में हो गई. घर वालों का कहना था की सब कुछ एक-दो घंटों में हो गया. आलम भाई अपनी शरीके हयात को खो देने पर बहुत ग़मगीन थे. तशिए जनाज़ा में काफी तादाद में लोग मौजूद थे. नमाज़े जनाज़ा हैदरी मस्जिद के पेश इमाम ने पढाई लेकिन उससे क़ब्ल मौलाना एहसान हैदर साहब ने एक मुख़्तसर खिताब किया और जनाबे मासूमए कौनैन (स.अ.) के मसाएब पढ़े.
घर वालों से गुफ्तगू करने पर मालूम हुआ की मरहूमा हाई ब्लड प्रेशर और शुगर की मरीजा थीं. इस से यह बात सामने आती हाई की "सब कुछ अचानक" हुआ नहीं कहा जा सकता. आज की तेज़ रफ़्तार ज़िन्दगी में अपनी सेहत की तरफ तवज्जो देना ज़रूरी है.
हाई ब्लड प्रेशर और शुगर इस दौर की सब से खतरनाक बीमारियाँ हैं. इन्हें नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता. यह दोनों बीमारियाँ जेहनी तनाव की वजह से वुजूद में आती हैं. चालीस साल की उम्र के बाद इन दोनों का चेक अप कराना चाहिए और अगर हाई ब्लड प्रेशर पाया जाए तो फ़ौरन इलाज शुरू कर दे. वरना शुगर हाई ब्लड प्रेशर के पीछे पीछे आती हाई. अपना इलाज खुद न करे बल्कि डॉक्टर की सलाह ले.
खाना इस हिसाब से खाए की ब्लड प्रेशर में वोह मुआविन न हो. मसलन, बड़े जानवर का गोश्त, ज्यादा नमकीन चीज़ें खाने से परहेज़ करे, जैसे दल मोठ, वेफर वगैरा. जेहनी तनाव से दूर रहने के लिए दोआ ज्यादा पढ़े और अल्लाह पर भरोसा रखे. पंद्रह बीस दिनों में ब्लड प्रेशर चेक करवाए.
शुगर का मरीज़ शकर से परहेज़ करे, ख़ास तौर पर शकर की चाए से. शरबत और कोल्ड ड्रिंक फ़ौरन शुगर बढा देते हैं. शुगर हाए होने से गुर्दे पर असर पड़ता है. पानी ज्यादा से ज्यादा पियें. अगर कुनकुना पानी करके पियें तो ज्यादा बेहतर है.
डॉक्टर या हकीम से इलाज करें. इन बीमारियों में परहेज़ ही इलाज है. ऐसे भी शुगर के मरीज़ हैं जो 40 - 50 साल से जियादा से इस बीमारी में मुब्तिला हैं और आम ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं.
लालच और बदपरहेज़ी ही बीमारियों को बढ़ाती है. ईलाज में काएदे से पैसे खर्च करवाती है. अच्छी सेहत के लिए पैग़म्बरे इस्लाम ने एक आसान नुस्खा बताया है, वोह है "पेट भर कर न खाना". और यह भी कहा है की "सूमू तुसेहू" रोज़ा रखो सेहतमंद रहो (माहे रमजान के अलावा भी).
क्यूंकि जान है तो जहान है.
16 फ़रवरी 2011
आलम भाई की अहलिया का इन्तेकाल
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13 फ़रवरी 2011
करारी में जुलूसे अमारी: 2011
इलाहबाद दोआबा इलाके में, बल्कि अगर यह कहा जाए की पूरे उत्तर भारत में, या फिर पूरे हिन्दुस्तान में आठ रबीउल अव्वल को अमारी का जुलूस इस तरह नहीं बरामद होता जिस तरह करारी में होता है. जुलूस का नज़्म इतना आला है की दूर दराज़ से लोग इसकी ज़ियारत करने आते हैं.
शबीहे तबर्रुकात तो हर जगह मिल जाएंगी लेकिन शाम क़ैद खाना जैसी शबीह कहीं न मिलेगी. शबीह बरामद होते हुए तक़रीर हर जगह होगी लेकिन हामिद चचा के मुनफ़रिद अंदाज़ में कहीं सुनने न मिलेगा. मैदान में तक़रीर और नौहा पढने के लिए तख़्त मिल जाएंगे लेकिन यहाँ जैसा स्टेज कहीं नज़र न आएगा.
इस जुलूस की कामयाबी का राज़ कारकुनान का ख़ुलूस है. दिन रात मेहनत के बाद ही यह यादगार बनता है. Volunteer हजरात अपना बिल्ला फखरिया लगाए हुए अपने अपने कामों में मसरूफ रहते हैं.
तश्हीर के लिए रंगीन और खुबसूरत हैंड बिल लोगों की तवज्जो अपनी तरफ खींचता हैं. जिस की वजह से अत्राफो अक्नाफ के साथ साथ बीरुनी मोमिनीन भी शिरकत करते हैं.
मौसम की शदीद ठंडक की वजह से जुलूस बरामद होने में ताखीर हो गई. पहली मजलिस के बाद जुमा की नमाज़ अदा की गई और फिर शबीहें बरामद हुईं. मेरठ से आए साहेबे बयाज़ ने बहुत अच्छा नौहा पढ़ कर माहौल को गरमा दिया. मीसम गोपालपुरी जो कई बरसों से मुसलसल शिरकत कर के नौहा पढ़ रहे थे इस साल किसी वजह से करारी नहीं पहुँच सके. खवातीन शबीहे ज़िन्दाने शाम की ज़ियारत मोकम्मल कर के अश्कबार आँखों से बाहर आतीं.
अब्बास रिज़वी के दिल्सोज़ नौहे ने अज़दारों को रुला दिया. ऐनुर रेज़ा (हुसैन) ने निजामत के फराएज़ अपने खुबसूरत अंदाज़ में अदा किए. इस तरह करारी वालों ने कर्बला से मदीना पहुंचे लुटे हुए काफले की याद मनाते हुए "कर्बला में सोनेवालो माहपारो अलविदा " का नौहा पढ़कर पुर जोश मातम करते हुए अय्यामे अज़ा को अलविदा कहा.
शबीहे तबर्रुकात तो हर जगह मिल जाएंगी लेकिन शाम क़ैद खाना जैसी शबीह कहीं न मिलेगी. शबीह बरामद होते हुए तक़रीर हर जगह होगी लेकिन हामिद चचा के मुनफ़रिद अंदाज़ में कहीं सुनने न मिलेगा. मैदान में तक़रीर और नौहा पढने के लिए तख़्त मिल जाएंगे लेकिन यहाँ जैसा स्टेज कहीं नज़र न आएगा.
इस जुलूस की कामयाबी का राज़ कारकुनान का ख़ुलूस है. दिन रात मेहनत के बाद ही यह यादगार बनता है. Volunteer हजरात अपना बिल्ला फखरिया लगाए हुए अपने अपने कामों में मसरूफ रहते हैं.
तश्हीर के लिए रंगीन और खुबसूरत हैंड बिल लोगों की तवज्जो अपनी तरफ खींचता हैं. जिस की वजह से अत्राफो अक्नाफ के साथ साथ बीरुनी मोमिनीन भी शिरकत करते हैं.
मौसम की शदीद ठंडक की वजह से जुलूस बरामद होने में ताखीर हो गई. पहली मजलिस के बाद जुमा की नमाज़ अदा की गई और फिर शबीहें बरामद हुईं. मेरठ से आए साहेबे बयाज़ ने बहुत अच्छा नौहा पढ़ कर माहौल को गरमा दिया. मीसम गोपालपुरी जो कई बरसों से मुसलसल शिरकत कर के नौहा पढ़ रहे थे इस साल किसी वजह से करारी नहीं पहुँच सके. खवातीन शबीहे ज़िन्दाने शाम की ज़ियारत मोकम्मल कर के अश्कबार आँखों से बाहर आतीं.
अब्बास रिज़वी के दिल्सोज़ नौहे ने अज़दारों को रुला दिया. ऐनुर रेज़ा (हुसैन) ने निजामत के फराएज़ अपने खुबसूरत अंदाज़ में अदा किए. इस तरह करारी वालों ने कर्बला से मदीना पहुंचे लुटे हुए काफले की याद मनाते हुए "कर्बला में सोनेवालो माहपारो अलविदा " का नौहा पढ़कर पुर जोश मातम करते हुए अय्यामे अज़ा को अलविदा कहा.
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11 फ़रवरी 2011
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